शुक्रवार, 14 दिसंबर 2007

18/3 उन्मुक्त आनंद का फलसफा-- मेरी प्रांत साहबी (आलेख संग्रह 3)

उन्मुक्त आनंद का फलसफा
--- लीना मेहेंदले

आज की तारीख में तंदूरी कांड से लेकर नताशा कांड तक की घटनाओं का जायजा लिया जाय तो वर्तमान भारत की उच्च वर्ग की संस्कृति के बदलाव को रेखांकित किया जा सकता है।
उदारीकरण और स्त्री मुक्ति के दौर ने एक ओर तो महिला के लिए बंद रहे कई दरवाजे खोल दिए। उसे घर से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाने के अवसर दिए। इस बात का स्वागत होना जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ महिला के लिए दिखावा नामक एक नई जंजीर भी पैदा कर दीं। उपभोक्तावाद और प्रदर्शनवाद ही उसका जीवन सिद्धान्त बन गया।
नई सदि के आते आते देश में करोडपति बनने की धूम मच गई। उसके पहले ग्लोबलायजेशन की प्रक्रिया ने हरेक को मजबूर कर ही दिया था कि वह करोडपति बनने की कोशिश करता रहे।
उच्च वर्ग की पहली और आखिरी विशेषता होती है धन। वह जमाना गया जब धन कमाने में काफी समय और काफी मेहनत पडती थी। आज भी जिसे ईमानदारी से धन कमाना है उसके लिए यही रास्ता है, लेकिन आज काला धन बटोरने के कई रास्ते खुल गये हैं। अब धन का यह नियम है कि वह जिस रास्ते से आता है, उसी रास्ते से जाता है। सो काला धन भी काले रास्ते से जाता है लेकिन जाते जाते अपनी चपेत में नहिलाओं को ले लेता है। इसकी वजह क्या है ?
उच्च वर्गी महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढा है लेकिन यह शिक्षा उन्हें वैज्ञानिकता, कलात्मकता या सृजन की तरफ नहीं ले जा रही, बल्कि उच्छृंखलता की ओर ले जा रही है। मदिरापान, क्लब और पब संस्कृति, और अर्द्धनग्नता को ही सक्षमीकरण का मापदंड माना जा रहा है जबकी पुरुषों के लिए मापदंड हमेशा अलग ही रहे।
अर्द्धनग्नता किस तरह हमारी पहचान बनी इसे इस बात से समझा जा सकता है कि पहले सिनेमा की हिरोइन कभी कैबरे नहीं नाचती थी, आज वह डान्स किसी और को मिला तो हिरोइन डरती है कि उसकी इमेज फीकी हो गई। प्रदर्शन के माहौल ने तत्काल उच्च वर्गी महिला को दो जरूरतों में बाँध दिया। पहली जरुरत कि उसके पास काफी पैसे हों और दूसरी कि वह सदा आमंत्रक, लुभावनी
लगती रहे। दोनों बातें एक दूसरे की पूरक भी हैं।
किसी उच्च शिक्षित महिला के पास ये दोनों हों तो वह क्या कर सकती है इसका एक उदाहरण मेरे मन पर बडी गहराई से छाया हुआ है। वह है एनरॉन चर्चित रेबेका मार्क जिसने भारतीय शासन -प्रशासन के कई दिग्गजों को साम दाम दंड भेद के प्रयोग से नाच नचा दिया और अपना मंतव्य पा ही लिया। पर हमारे देश की महिला के लिए वैसी बात कल्पना से भी परे है। फिर काहे का सक्षमीकरण ?
नताशा, जेसिका, अंजू जैसे कई नाम गिनाए जा सकते हैं जहाँ इस नई संस्कृति की मार महिला पर ही पडी। ऐसी महिलाओ के पास आय का कोई अपना ヒाोत नही था, अतएव वे उन पुरुषों पर निर्भर थीं जो पैसा देते। फिर या तो उनका उपयोग किया जाता था या उनका अंत हो जाता था। अंत को भले ही कई बार आत्महत्या घोषित किया गया हो, लेकिन उस कगार तक पहुँचने का कारण भी आर्थिक परावलंबिता ही था। उस ड्रामें में पुलिस का भी रोल था और मिल्कियत जताने वाले परिवार के सदस्यों का भी। उनका उपयोग कहाँ कहाँ हो सकता है इसकी एक झलक तो तहलका कांड ने भी दिखा दी। दूसरी झलक तब मिली जब काँग्रेस पार्टी की
नागपूर स्थित महिला उपाध्यक्ष ने टिकट बँटवारे में यौन शोषण का आरोप किया।
उच्च वर्ग की अधिकतर महिलाओंका सपना क्या होता है ? यही कि वे पार्टियों की रौनक बनीं रहें। उनके पास कारें तथा सुविधा के अन्य साधन हों, और वे जीवन का आनंद भरपूर उठायें। मीडिया और विज्ञापनों ने भी इसे खूब बढावा दिया है। उसने तो एक और सपना भी जोड दिया --- टी.वी.स्क्रीन पर झलकने का। क्या ऐसे सपने गलत हैं ? शायद नहीं। तो फिर विसंगति कहाँ है ?
विसंगति यही है कि अपने सपने को अपना हक माना जाता है, चाहे योग्यता हो या न हो। जब वह नही होती तो माना जाता है कि रूप और यौवन उनके पर्याय हैं। जहाँ धन और सुविधाएँ हैं उनका उपयोग योग्यता बढाने में नहीं बल्कि आनंद उठाने और मौज मस्ती में ही सार्थक समझा जाता है। ये वो दौर है जिसमें सब कुछ जायज है, विवाह बाह्य संबंध भी। लेकिन फिर पुरुषी अहंकार को चोट लगती है, खानदान की इज्जत का सवाल उठाया जाता है और कटारा कांड भी हो जाता है।
देखें कि उन सारी घटनाओं पीछे उच्च वर्ग का पुरुष कहाँ है ? तो हर जगह है। उसे धन और आनंद के साथ साथ सत्ता की भी
लालसा है, जिसके लिए औरत सीढी बन सकती है। इनकार करे तो उसे तंदूर में जलाया जा सकता है। और सजा की चिन्ता क्यों हो, जब पैसे के बल पर मुकदमें की सुनवाई को जितनी मर्जी हो घसीटा जा सकता है।
धन, सत्ता और उन्मुक्त आनंद, यह एक त्रिकोण बन गया है। उच्च वर्ग की महिला को ये सारे चाहिये और झटपट चाहिये। दिल्ली के कई फार्म हाउस पार्टी और पब के अड्डे बने हुए हैं जहाँ मदिरा है, रूप यौवन है और एक फलसफा है कि असली जिन्दगी यही है। कभी कभी जब वहाँ से झूमते झामते बाहर निकले लडके लडकियाँ कार एक्सिडेंट में किसी की जान ले लेते हैं तो दो चार दिन हो हल्ला मचता है और उन्मुक्तता फिर अबाधित चलने लगती है। कभी किसी जेसिका की जिद को खतम करने के लिए इतने सहज भाव से गोलियाँ दग जाती हैं, मानों यह कोई रोजमर्रा की बात हो। कोई नही पूछता कि क्या गोली चलानेवाला हमेशा से इसका आदी
है। क्यों कि कानून कहता है, उसकी आदतों से हमें कुछ लेना देना नही है, यह बात भुला दी जाती है कि जिसे इस तरह के शक्ति प्रदर्शन की आदत बन गई हो वही इतनी जल्दी गोलियाँ चला सकता है।
काला धन, रिश्र्वतखोरी, हवाला, सभी इस त्रिकोण को सशक्त बनाते हैं। राजकीय और कानूनी आश्रय भी मिल जाते हैं। अभिषेक वर्मा हो या कस्टम के उच्च अधिकारी, काला धन उनके तकिए, गिलाफ और सोफा सेटों के अंदर छिपाया हो या हजारों साडियाँ, जूते, हीरे, गहनों के माध्यम से छलक रहा हो, आज तक किसी पर मुकदमा सिद्ध नही हो सका है। केवल उन महिलाओं के हिस्से में दुष्परिणाम आया, जो एक ओर तो उसी उन्मुक्तता की दुनियाँ की लालसा में थीं पर एक ओर अपने वजूद के लिए विद्रोह भी कर रहीं थीं, यह भूलकर कि वजूद अपनी योग्यता और कुशलता से बनता है, केवल शराब और सेक्स के दर्शन से नहीं।
तंदूरी कांड से नताशा कांड, क्या कहता है इतिहास ? झटपट धन, सत्ता और उपभोग के त्रिकोण ने कभी महिला को राजकीय नेताकी वासनापूर्ति का साधन बनाया। कभी खुलेपन और पारंपारिकता के द्वंद में उसकी हत्या -कम - आत्महत्या हुई। कभी आनंद भोगने के लिए बने शराब और कार - स्पीड की कॉकटेल ने उसकी जान ली। कभी अहंकारी पुरुष को ललकारने का दुसाहस उसे ले डूबा। पुलिस, मीडिया और न्याय व्यवस्था अलसाए और
चटखारे लेते रहे।
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ई- १८, बापु धाम, सेंट मार्टिन मार्ग, नई दिल्ली, ११००२१
(रा. स. को भेजा १.४.२००२ प्रकाशन दि, )

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